रविवार, 14 दिसंबर 2014

# अरमान दिल के #

कैसी -कैसी  ख्वाईशे है ,
कैसे तुम्हे समझाये                  
मै शर्मा सा जाता हूँ,
जब शब्द जुंभा पे आये। 

उसकी बाहों में खो जाऊं,
या 
आँचल में मै सो जाऊं 

उसके होठों को छू लूँ ,
या 
उसकी नैनो से पी लूं। 

उसके मस्तक की बिंदिया ,
मेरी दुनिया सारी।

      

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

# मेरी प्राथना #

ओ भोले भंडारी सुन ले ,
बात हमारी सुन ले। 

वैसे तो मैं कुछ न मांगू ,
फिर भी दे दे दुनिया सारी। 

दुःख के बंधन पास न आये ,
सुख के कँगन टूट न पाये। 

सुबह रहे होली के रंग ,
शाम रहे रंगोली के संग। 

ओ भोले भंडारी सुन ले ,
बात हमारी सुन ले। 

###  कवी संतोष शर्मा 

नारी - धर्म

                    हमेशा से नारी पर  तरह - तरह के अत्त्याचार हुए , होते है , और मुझे ऐसा प्रतीत होता हैं की इस की संख्य़ा बढ़ती ही रहेंगी |
क्यों ...?
                   क्यों की कमजोर को जीने का अधिकार नहीं है , दुसरो के लिए जीने के लिए मरने का भले हो |
सभी नारियों को अब मजबूत इरादा रखना होंगा , बगावत करना होंगा , आक्रमण ही बचाव का सबसे अच्छा
तरीका है .... यह समज़ना होंगा ...

                    मेरी इस कविता से मै कुछ सोच जगाना चाहता हूँ | और अच्छी लगे तो हर नारी तक पहुँचाने का सह:योग करे |

जिस दिन नारी खंजर ले ,
      सीने पर चढ़ जायँगी ।
उस दिन किस पापी की नजरें,
      चीर - हरण  कर पायेंगी ।

रंग बिरंगे  नख , जब ,
      आँखो में गड़ जाएंगे।
उस दिन जुल्मी नापाक ईरादे ,
      सीने में सड़ जाएंगे।

मृद भाषी  बलाए जब ,
      बोटी काट क़े खाएंगी।
उस दिन हैवानों कि
     रूह कॉप फिर जायँगी।

जिस दिन तन - मन  , संकट पर
      घुटने टेक झुक जायेंगा।
उस दिन चमत्कार भी ,समझो
     बेअसर हो जायेंगा।

लड़ने का जस्बा हो तो ,
    पत्थर भी बम बन जाता है।
ऐसे तो हतियार हाथ में
     फ़ूलों सा रह जाता है।

स्वाभिमान की रक्षा पर ,
  तूम्हे क्रूर बन जाना होंगा |
अबला न बन ,
    पापियों पर बला बन जाना होंगा |

जिस दिन मेनिका का ,
  काली में परिवर्तन होंगा |
उस दिन सच में ,
  नारी का "जन गण मन " होंगा |

पाक कला में निपुण , हाथो से
  चीर फाड़ कर जाना होंगा |
निर्भय हो कर रण-भूमि में ,
  वरिंगाना कहलाना होंगा |
   
====================संतोष शर्मा (स्तभ्त )

   






प्यार न्यू स्टाइल

प्यार मोह्बत्त क्या है यार ,
        येः है दो धारी तलवार।
समझ में इसके आतें ही ,
       मती मारी जाएँ सरकार।

ढ़ाई अछर प्रेम का ,
      पढ़े सो पंडित होये।
इस पण्डिताई में ,
      देर करें ना क़ोई।

पंडिताई की इस गाथा को ,
  जिसने किया प्रणाम ,
फिर तो "सनी लीओन " के
  सपनो में गुज़रे सुबह शाम |


अब तो मम्मी पापा ,
     बस इतना देखें यार।
सेम सेक्स में मुण्डा ,
     कर न बैठें प्यार।

शेर भी बन जाये चूहा ,
     देख़ येः महफ़िल।
करने गया शिकार ,
     छोड़ आया दिल।

प्यार मोहब्बत की बातें ,
    होती कँहा सच्ची ।
झूठ मुठ की बातो में
    खो जाएँ तंदुरस्ती ।


इतने पर भी यारों ,
    ख़तम न हो मुश किल।
करते ही इजहारे इश्क़ ,
    पारियाँ जाती हैं मिल ।

बहुत कुछ बोल गया मैं ,
    अब् बिंदु पर आता हूँ ।
माँ का नाम ना हो बदनाम
    ऐसा प्यार मैं चाहता हूँ।

###################  कवि  संतोष शर्मा (स्तभ्त)










रविवार, 5 जनवरी 2014

गलतफहमी

"यह तो सबसे बड़ी बीमारी है जिसका सबसे बड़ा कारण है , अहम् (अहंकार) । क्यों यह गलतफ़हमी फैलती है । क्यों की हम कही गई बातो को अलग रूप में समज़ते हैं । 

कभी मुस्कुराने के लिए उठे  थे हम ,       
       ख्यालों में  हमारे  न चाहत कम ।
कभी सोचा नहीं था  यह वक़्त भी आएंगा 
      अश्को का अम्बर होटों से इस कदर टकरएंगा ,

गलतफहमी  की शाखों से
      दिल हार जायंगा  
शब्दो के तीर से
      जीना मुस्किल हो जाएंगा।






कुछ ज्यादा

जब भी मैंने ज़िन्दिगी से चाहा कुछ  ज्यादा,
         खुशी का चन्द्रमा नजर आया मुझे आधा।

सब कुछ पाने क़ी चाहत में ,
         मंज़िल तो मैं भूल गया ,

चलते चलते  थक गया तो
        नजर  आया वो मंजर।
मेरी चाहत में जो तड़पे
        मैंने उनको भुला दिआ
छोड दिये थे पल जो मैंने
        जी ना पाउ फिर दुबारा

 
याद करेंगी दुनिया मुझ को शायद
पर
खुद कि नजरो में मै बेचारा

सोमवार, 26 अगस्त 2013

अरमान दिल के जब



कुछ तो होंगा उसकी आखों में ।

इस कदर तो  कोई खामोश नहीं होता ।

नफरत प्यार हो जाये जब किसी से

इन्सान सोचने के लायक नहीं होता ।

कहते है कोशिश करने वालों की हार  नहीं होती ,

पर ये भी सच है हर किसी की कश्ती पार नहीं होती ।

फिर भी है इंतजार में नजरे बिछाये हम ।

अगर मंजिल तक ना पहुचे पायें  कदम

तो किसी का रास्ता ही बन जाये हम ।

------------------------------------------------------------------------------------लेखख  संतोष शर्मा